हाईकोर्ट के सख्त आदेश के बाद भी सलारगंज का अल हबीब हॉस्पिटल चर्चा में, अवहेलना के आरोपों से घिरा स्वास्थ्य विभाग।

हाईकोर्ट के सख्त आदेश के बाद भी सलारगंज का अल हबीब हॉस्पिटल चर्चा में, अवहेलना के आरोपों से घिरा स्वास्थ्य विभाग।

हाईकोर्ट के आदेश की अवहेलना? लाइसेंस निरस्त होने के बाद भी अल हबीब हॉस्पिटल पर उठे सवाल।

सलारगंज का अल हबीब हॉस्पिटल विवादों में, कोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद कार्रवाई अधूरी।

जनपद में अवैध अस्पतालों पर कब लगेगा अंकुश? हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी हालात जस के तस।

रिपोर्ट, जेड ए सिद्दीकी/सरफ़राज़ आलम

बहराइच। दरगाह क्षेत्र के मोहल्ला सलारगंज में संचालित अल हबीब हॉस्पिटल का लाइसेंस निरस्त किए जाने के बाद भी कथित रूप से अस्पताल परिसर में गतिविधियां जारी रहने की चर्चाओं ने पूरे जनपद में हलचल पैदा कर दी है। हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद हालात “जस के तस” बने रहने की बात सामने आने से स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। मामले की शुरुआत उस समय हुई जब सिविल कोर्ट बहराइच के अधिवक्ता अशरफ सिद्दीकी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में याचिका दाखिल कर अस्पताल के लाइसेंस और संचालन में गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाया। याचिका में कहा गया कि अस्पताल बिना उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनापत्ति प्रमाण पत्र तथा बिना नगर मजिस्ट्रेट से भवन का नक्शा स्वीकृत कराए संचालित किया जा रहा है। साथ ही बिना अधिकृत स्त्री रोग विशेषज्ञ के महिला मरीजों के ऑपरेशन एवं प्रसव कराए जाने का भी आरोप लगाया गया। 9 फरवरी को न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला एवं न्यायमूर्ति शेखर बी. शराफ की डबल बेंच ने सुनवाई के दौरान मामले को गंभीरता से लेते हुए मुख्य चिकित्साधिकारी (सीएमओ) को आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि अस्पताल निर्धारित मानकों का पालन नहीं कर रहा है तो उसका लाइसेंस निरस्त कर संचालन पर तत्काल रोक लगाई जाए।न्यायालय के आदेश के अनुपालन में सीएमओ डॉ. संजय कुमार ने अस्पताल का पंजीकरण निरस्त कर दिया। बताया गया कि अस्पताल का लाइसेंस 15 मई 2025 से 14 मई 2030 तक वैध था, जिसे कोर्ट के निर्देश पर समाप्त किया गया। नैदानिक अधिकारी एवं पंजीकरण नोडल उप मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. अनुराग वर्मा ने संचालक को अस्पताल का बोर्ड हटाकर कार्यालय में जमा करने तथा किसी भी प्रकार की चिकित्सीय गतिविधि बंद करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही चेतावनी दी गई कि आदेश की अवहेलना पाए जाने पर कठोर विधिक कार्रवाई की जाएगी। हालांकि स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि अस्पताल में गतिविधियां पूरी तरह बंद नहीं हुई हैं। यदि यह सही पाया जाता है तो इसे न्यायालय के आदेश की सीधी अवहेलना माना जाएगा। इससे स्वास्थ्य विभाग की प्रभावशीलता पर भी प्रश्नचिह्न लग रहे हैं और यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या संबंधित विभाग उक्त अस्पताल के सामने बौना साबित हो रहा है। गौरतलब है कि जनपद में निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम्स के संचालन को लेकर समय-समय पर शिकायतें उठती रही हैं। सूत्रों का कहना है कि जिले में कई ऐसे अस्पताल संचालित हो रहे हैं, जो पूर्ण मानकों और आवश्यक स्वीकृतियों के बिना कार्य कर रहे हैं। ऐसे में मरीजों की सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर गंभीर चिंता व्यक्त की जा रही है। अब सबकी निगाहें प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि न्यायालय के आदेशों का कड़ाई से पालन नहीं कराया गया तो यह कानून व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही दोनों के लिए गंभीर विषय बन सकता है।

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